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सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

हिंदू होने का धर्म : जाति की संकीर्णता वर्ण की वजह से नहीं


हिंदू होने का धर्म : जाति की संकीर्णता वर्ण की वजह से नहीं


सनातन धर्म का सबसे बड़ा अभिशाप जाति की दीवारों को माना जाता है, इसकी संकीर्णता को माना जाता है और जातिगत बंधनों को ही सनातन धर्म का सबसे बड़ा दोष और धब्बा भी माना जाता है. यह सत्य भी है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि वर्तमान जाति-व्यवस्था की बंदिशों और मानव-मानव के बीच भेदभाव ने सनातन धर्म के मूल तत्व पर ही प्रहार किया है और इसकी उदात्तता और उदारता पर ही प्रश्नचिह्न लगाया है. सवाल यह जायज भी है कि आखिर वसुधैव कुटुंबकम की बात करनेवाला धर्म अपने ही कुछ अनुयायियों को अस्पृश्य और त्याज्य क्यों मानता है.
धारणा यह है कि जाति व्यवस्था का यह वर्तमान स्वरूप वर्णाश्रम व्यवस्था की ही देन है. यह निहायत ही ग़लत अवधारणा है. इस पर चर्चा विस्तार से आगे. पहले तो यह जानें कि वर्ण क्या है. सनातन धर्म में कर्म के आधार पर मानव समुदाय को चार वर्णों में बांटने की व्यवस्था की गई-चातुर्वर्ण्यं मया स्रष्टं गुण-कर्म विभागशः (गीता)- जो कालांतर में जाति-प्रथा के ज़हर में बदल गई. वैसे कर्म के आधार पर केवल सनातन धर्म में ही मनुष्यों का विभाजन किया गया है, ऐसा नहीं है. यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने भी मनुष्यों की चार जातियों का उल्लेख किया है. इसी तरह पारसियों के सर्वोच्च धर्म ग्रंथ जेंद अवेस्ता में भी मनुष्यों की चार जातियों या वर्णों का उल्लेख है. अवेस्ता में इनके नाम आथ्रवन (ब्राह्मण), रथैस्तार (क्षत्रिय), वारस्त्रयोष (वैश्य) और हुतोक्ष (शूद्र) हैं. सनातन धर्म में जिस तरह द्विजों का उपनयन संस्कार होता था, उसी तरह पारसियों में भी नवजोत (नवजात) संस्कार किया जाता है. इसमें उऩको मेखला, पवित्र कुरता और टोपी पहनाई जाती है. कहने का मतलब यह कि समाज की व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए और चलाए रखने के लिए सनातन धर्म के अलावा भी कई समाजों में वर्ण के आधार पर मनुष्य को विभाजित करने का रिवाज था.
ठीक इसी तरह, वर्ण व्यवस्था को जाति का पूरक मान लेना भी ग़लत होगा. ऋग्वेद या कहें वैदिक काल तक तो सनातन धर्म त्रिवर्णी ही था. ऋग्वेद में शूद्र शब्द का इस्तेमाल केवल एक बार हुआ है, वह भी पुरुष सूक्त में. वेदों और उपनिषदों का रहस्य उद्घाटित करनेवाले जर्मन विद्वान मैक्समूलर और कोलब्रुक दोनों ही पुरुष सूक्त को क्षेपक (बाद में जोड़ा गया) मानते हैं. इन दोनों ही मनीषियों के अनुसार पुरुष सूक्त की भाषा और शैली इसे ऋग्वेद से अलग खड़ा करती है. इसी तरह राजन्य शब्द का भी प्रयोग ऋग्वेद में एक ही बार हुआ है. ठीक इसी तरह रंग के आधार पर मनुष्यों के वर्ण का निर्धारण महाभारत काल में ही किया गया है. इसी में बताया गया है कि क्षत्रिय लाल रंग के, ब्राह्मण गौर वर्ण के और शूद्र काले रंग के होते हैं. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ऋग्वेद काल तक सनातन धर्म में त्रिवर्णों का ही उल्लेख था. साथ ही, वर्ण व्यवस्था में शूद्रों को सबसे नीचे का और अधिकाधिक बंधनों का पायदान भी मनुस्मृति के बाद ही दिया गया. मनुस्मृति में ही यह तय कर दिया गया कि शूद्रों का काम केवल द्विजों की सेवा करना है, ब्राह्मण अपनी मर्जी से जब और जहां चाहें, शूद्रों को भेज सकते हैं और जितनी चाहें उतनी ताड़ना कर सकता है. आज के दौर तक आते-आते निश्चय ही जाति-व्यवस्था अपने सबसे गर्हित और पतनशील रूप में दिखाई पड़ती है. कैसी अचरज की बात है कि जो सनातन धर्म अपने अनुयायियों को चिंतन और वाणी की पूरी स्वतंत्रता देता है, वही सनातन धर्म व्यवहार के स्तर पर बिल्कुल कठोर है. कोई भी सनातनी व्यवहार और कर्म के स्तर पर जाति-प्रथा की अवहेलना नहीं कर सकता. सबसे निंदा की बात यह है कि शुरुआती चार वर्णों से आज शताधिक जातियां बन गई हैं, और उनमें अंत्यज औऱ अस्पृश्य भी शामिल हैं.
एक बात औऱ गौर करनेवाली यह है कि वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था अपने शुरुआती रूप में काफी लचीली थी. तभी तो ऋग्वेद के दशम मंडल के 102वें सूक्त का ऋषि कहता है-मैं कवि हूं, मेरा पिता वैद्य है और मेरी मां पिसान करती है. इसी तरह एक ही क्षत्रिय गाधि(पुरुरवा के वंशज) के पुत्र विश्वामित्र तो क्षत्रिय ही रहे, लेकिन उनके जामाता ऋचीक ब्राह्मण थे. इसी तरह गाड़ीवान रैक्व को भी उपनिषदों का ऋषि माना गया है. यहां तक कि जाबाला पुत्र सत्यकाम को भी ब्रह्मविद्या के रहस्य का उद्घाटन करने लायक माना गया है, जबकि उनकी माता जाबाला को ही यह नहीं पता था कि वह किस पुरुष के औरस से पैदा हुए हैं. वेदकालीन राजा सुदास शूद्र थे और वह राजर्षि विश्वामित्र के संरक्षक थे. सुदास ने अश्वमेध भी किया था, इसका भी उल्लेख आया है. ऐसे कई उदाहरण उपनिषदों, वेदों और पुराणों में मिल जाते हैं. कहने का मतलब यह कि प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था का यह घटिया स्वरूप देखने को नहीं मिलता था, जो आज चारों ओर से सनातन धर्म को अपनी जकड़ में लिए हुए है. कोई भी व्यक्ति किसी भी जाति से दूसरी जाति में संक्रमण कर सकता था और उसकी जाति का निर्धारण मुख्यतः उसके कर्म से ही होता था.
गंगा भी इलाहाबाद औऱ पटना आकर काफी दूषित हो जाती है, किंतु उसमें गंगा के उद्गम का तो कोई दोष नहीं. यही बात सनातन धर्म के साथ भी है. जाति प्रथा पर विस्तार से चर्चा अगले अंकों में.

सनातन धर्म को समझना आसान नहीं


सनातन धर्म को समझना आसान नहीं


सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है. हालांकि, सच्चाई तो ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग कई बार इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं. सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है. न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ. यह तो समय-समय पर पैदा हुए दार्शनिकों और मनीषाओं के विचारों का संग्रह है. इसका सतत विकास हुआ. समय की धारा के साथ ही यह भी प्रवहमान और विकसमान रहा. साथ ही यह किसी एक द्रष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता. कोई एक विचार सर्वश्रेष्ठ इसी वजह से कई सारे पूरक सिद्धांत भी बने. यही वजह है कि इसके खुलेपन की वजह से ही कई अलग नियम इस धर्म में हैं. यही विशेषता इसे अधिक ग्राह्य और सूक्ष्म बनाती है. इसका मतलब यह है कि अधिक सरल दिमाग वाले इसे समझने में भूल कर सकते हैं. अधिक सूक्ष्म होने के साथ ही सनातन धर्म को समझने के कई चरण और प्रक्रियाएं हैं, जो इस सूक्ष्म सिद्धांत से पैदा होती हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सरल-सहज मस्तिष्क वाले इसे समझ ही नहीं सकते. पूरी गहराई में जानने के लिए भले ही हमें गहन और गतिशील समझदारी विकसित पड़े, लेकिन सामान्य लोगों के लिए भी इसके सरल और सहज सिद्धांत हैं. सनातन धर्म कई बार भ्रमित करनेवाला लगता है और इसके कई कारण हैं. अगर बिना इसके गहन अध्ययन के आप इसका विश्लेषण करना चाहेंगे, तो कभी समझ नहीं पाएंगे. इसका कारण यह कि सनातन धर्म सीमित आयामों या पहलुओं वाला धर्म नहीं है. यह सचमुच ज्ञान का समुद्र है. इसे समझने के लिए इसमें गहरे उतरना ही होगा.
सनातन धर्म के विविध आयामों को नहीं जान पाने की वजह से ही कई लोगों को लगता है कि सनातन धर्म के विविध मार्गदर्शक ग्रंथों में विरोधाभास पाते हैं. इस विरोधाभास का जवाब इसी से दिया जा सकता है कि ऐसा केवल सनातन धर्म में नहीं. कई बार तो विज्ञान में भी ऐसी बात आती है. जैसे, विज्ञान हमें बताता है कि शून्य तापमान पर पानी बर्फ बन जाता है. वही विज्ञान हमें यह भी बताता है कि पानी शून्य डिग्री से भी कम तापमान पर भी कुछ खास स्थितियों में अपने मूल स्वरूप में रह सकता है. इसका जो जवाब है, वही सनातन धर्म के संदर्भ में भी है. जैसे, विज्ञान के लिए दोनों ही तथ्य सही है, भले ही कितूने विरोधाभासी हों, उसी तरह सनातन धर्म भी अपने खुलेपन की वजह से कई सारे विरोधी विचारों को ख़ुद में समेटे रहता है. हम पहले भी कह चुके हैं-एकं सत, विप्रा बहुधा वदंति-उसी तरह किसी एक सत्य के भी कई सारे पहलू हो सकते हैं. कुछ ग्रंथ यह कह सकते हैं कि ज्ञान ही परम तत्व तक पहुंचने का रास्ता है, कुछ ग्रंथ कह सकते हैं कि भक्ति ही उस परमात्मा तक पहुंचूने का रास्ता है. सनातन धर्म में हर उस सत्य या तथ्य को जगह मिली है, जिनमें तनिक भी मूल्य और महत्व हो. इससे भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है. आप उसी रास्ते को अपनाएं जो आपके लिए सही और सहज हो. याद रखें कि एक रास्ता अगर आपके लिए सही है, तो दूसरे रास्ते या तथ्य ग़लत हैं. साथ ही, सनातन धर्म खुद को किसी दीवार या बंधन में नहीं बांधता है. ज़रूरी नहीं कि आप जन्म से ही सनातनी हैं. सनातन धर्म का ज्ञान जिस तरह किसी बंधन में नहीं बंधा है, उसी तरह सनातन धर्म खुद को किसी देश, भाषा या नस्ल के बंधन में नहीं बांधता. सच पूछिए तो युगों से लोग सनातन धर्म को अपना रहे हैं.

बौद्ध धर्म और सनातन धर्म


बौद्ध धर्म और सनातन धर्म


इसे विडंबना कहें या सनातन धर्म की पचाने की क्षमता, जो भी धर्म या आंदोलन इसकी बुराइयों से निपटने के लिए शुरू हुए, वे भी इसके ही रंग में ही ढल गए. जो भी इसके विरोध में किया गया, कालांतर में वही ठीक सनातनी कलेवर में रंग गया. यही बात बौद्ध धर्म के साथ भी लागू होती है. जाति-व्यवस्था और ढकोसलों के ख़िला़फ ही इसकी शुरुआत हुई, लेकिन बाद में चलकर बौद्ध धर्म में भी वही सारे विकार आ गए. जाति-प्रथा बौद्ध धर्म में भी लागू रही, बस शीर्ष पर ब्राह्मण की जगह क्षत्रिय विराजमान हो गया.
बुद्ध ने अवतार की, मूर्तिपूजा की और पुनर्जन्म वगैरह को सिरे से नकार दिया था, लेकिन बौद्ध धर्म की महायान शाखा में तो देवताओं की लड़ी ही लग गई. बुद्ध को अवतार घोषित कर दिया गया और बड़ी-बड़ी मूर्तियां मठों में स्थापित कर मूर्ति पूजा भी होने लगी. बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा में तो इतनी गंदगी हुई, कि लोग वज्रयानियों को कापालिकों से भी बुरा समझने लगे. ख़ैर, इस पर चर्चा फिर कभी.
कुल मिलाकर इतना ही कि बुद्ध की यह बात लगभग सही सिद्ध हो गई जो उन्होंने आनंद से कही थी. मठों में भिक्षुणियों को शामिल होने की इजाज़त देते हुए बुद्ध ने कहा था- आनंद, पहले यह धर्म शायद 5000 वर्षों तक चलता, लेकिन अब तो यह केवल 500 साल चलेगा, क्योंकि धर्म में भिक्षुणियों को भी आज्ञा मिल गई है. हालांकि बौद्ध धर्म के कालबाह्य होने के पीछे कई कारण थे. बौद्ध धर्म में शुरू से ही तीन मार्ग थे. अर्हत-यान का पालन वे श्रावक करते थे, जिनका लक्ष्य अपना मोक्ष होता था. इसके अलावा जो साधक या श्रावक अपने साथ ही कुछ और लोगों के लिए भी कष्ट सहने को तैयार थे, उनका रास्ता प्रत्येक-बुद्ध-यान था. तीसरा और सबसे कठिन रास्ता बुद्ध-यान का था, जिसपर
बुद्ध-यान का था, जिसपर वही साधक चलता था, जो तमाम जीवों का मार्गदर्शक बनने के लिए अपनी मुक्ति और मोक्ष की ़िफक्र न कर बहुत कष्ट और परिश्रम के बाद ही स्वयं प्राप्त निर्वाण को अपना लक्ष्य मानते थे. आरंभ में तो सभी बौद्ध तीनों यान को मानते थे, लेकिन कालांतर में बौद्ध धर्म का विभाजन इन्हीं के आधार पर हीनयान और महायान में हुआ. कालक्रम में बुद्धयान निःस्वार्थ यान होने के कारण ही महायान कहा जाने लगा जबकि बाक़ी दोनों यानों को हीनयान कहा जाने लगा.
इसके बाद सनातन धर्म का प्रभाव बौद्ध धर्म पर भी पड़ा. मानव स्वभाव मूल रूप से साकार को खोजता है, निराकार से वह ख़ुद को जोड़ नहीं पाता. यही वजह रही कि बाद में बुद्ध की भी विशाल मूर्तियां बनने लगीं और बाक़ायदा उनकी पूजा की जाने लगी. अंधविश्वास और रूढ़ियों का भी बौद्ध धर्म में प्रवेश हो गया और वज्रयान संप्रदाय तो बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा कलंक बन गया. भिक्षुणियों के आगमन से नारी-समागम की भी शुरुआत हो गई और मुद्रा के नाम पर कई तरह के अनाचार बौद्ध धर्म का भी हिस्सा बन गए. महायान का हालांकि ऐतिहासिक महत्व इस वजह से है क्योंकि करुणा और मैत्री का शिखर हम महायान में देखते हैं, ठीक उसी तरह जैसे, अहिंसा का चरम विकास हम जैन धर्म के अनेकांत दर्शन में देखते हैं. बाद में तो ख़ैर बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा भी आ गई और इस पर शाक्त प्रभाव भी पड़ा. अवतारवाद की धारणा भी बौद्ध धर्म का हिस्सा बन गई. इसी वजह से बोधिसत्वों का भी उल्लेख होने लगा. 

सनातन धर्म का बौद्ध कलेवर


सनातन धर्म का बौद्ध कलेवर


एक बड़े चिंतक हुए हैं-पूसिन. उन्होंने बौद्ध धर्म पर लिखते हुए एक बड़ी गज़ब बात कही है. वह मानते हैं कि बौद्ध धर्म कोई नया धर्म नहीं, बल्कि वह तो सनातन धर्म का बौद्धीकरण करने की ही कोशिश थी. इसे क्या काफी हद तक ठीक न मान लिया जाए? आख़िर, बौद्ध धर्म में भी तो जो भावनाएं, विचार और संस्थाएं देखने को मिलती हैं, क्या उन्हें देखकर नहीं लगता कि वे सभी सनातन धर्म का बौद्धीकृत स्वरूप ही थे? सनातन धर्म के मूल तत्व क्या हैं? पुनर्जन्म का सिद्धांत, आवागमन की बातें, अवतारवाद और कर्मफल के अनुसार दंड या पुरस्कार मिलने की बात. यही बात अपने तेवर और अंदाज़ बदल कर बौद्ध धर्म में भी देखने को मिलती है. ये सारे सिद्धांत तो बीज रूप में सनातन धर्म में ही मौजूद थे, बस बौद्ध धर्म ने उसको नई शब्दावली दे दी. यहां तक कि सनातन धर्म में जो भगवान या त्राता का विचार था, वह भी नए स्वरूप में बौद्ध धर्म में आ गया. यह भले ही बौद्ध धर्म की महायान शाखा में ही क्यों न हुआ हो. भगवान या ईश्वर के जो विविध अवतारों और रूपों की अवधारणा सनातन धर्म में थी, वही चोर दरवाज़े से बौद्ध धर्म में बोधिसत्वों का रूप धर कर दाख़िल हो गई.
अगर सच पूछा जाए तो सनातन धर्म का विकास जिन-जिन दिशाओं में हो रहा था, उन्हीं दिशाओं में बौद्ध धर्म भी विकसित हो रहा था. महायान शाखा में भक्ति का पुट भी निश्चित तौर पर सनातन धर्म की ही देन थी. बौद्ध मत मुख्य तौर पर बुद्धिवाद की बात करता था. इसमें कर्मकांड, यज्ञ-हवन और अंधविश्वास का विरोध शामिल है. हालांकि यह भी बौद्ध धर्म का मौलिक आविष्कार तो नहीं ही कहा जा सकता. सनातन धर्म की अन्य शाखाओं, जैसे औपनिषदिक काल, वेदांत और नास्तिक दर्शन के व़क्त भी सनातन धर्म की इन बेहूदगियों के ख़िला़फ आवाज़ उठाई जाती रही थी. यहां तक कि बौद्ध मत का निराशावाद, ऊंची नैतिकता, कृच्छाचार (तपस्या से शरीर को दंडित करना) और मानवीयता-इन सब में से ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे बौद्ध धर्म का मूल कहा जा सके. ये सारे तत्व समय-समय पर सनातन धर्म में प्रकट होते रहे थे. बौद्ध धर्म ने बस उसे अपने तरीके और नए जोश से पेश कर दिया. महात्मा बुद्ध ने बस इन गुणों पर अधिक ज़ोर दिया और इसे ही धर्म का मूल आयाम बना दिया. इस हिसाब से देखें तो बुद्ध तो सनातन धर्म के शोधक थे, संहारक नहीं. इसका एक प्रमाण यह भी है कि पहले तो गृहस्थ बौद्ध बने ही नहीं, क्योंकि मान्यता थी कि संसार से विरक्त और त्यागी व संन्यासी लोग ही बौद्ध हो सकते हैं. दूसरी बात यह है कि जब गृहस्थों ने बौद्ध बनने की शुरुआत की, तो भी वे अधिकतर मामलों में सनातनी ही बने रह गए, क्योंकि उपनयन, विवाह और श्राद्ध वगैरह संस्कारों के लिए तो बौद्ध धर्म में कोई व्यवस्था ही नहीं थी.
यहां सवाल यह उठ सकता है कि आख़िर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच इतने तीव्र संघर्ष का कारण क्या था? इसका कारण कहीं से भी वैचारिक नहीं था. असल में बौद्धों ने यज्ञों और कर्मकांडों का पुरज़ोर विरोध किया, जिस पर बेचारे ब्राह्मणों की रोजी चलती थी. यही कारण था कि बौद्ध हमेशा ब्राह्मणों की आंखों की किरकिरी बने रहे और मौक़ा मिलते ही उन पर चढ़ाई कर दी गई. दूसरी वजह यह थी कि राज्याश्रय पाकर बौद्ध मठों में ख़ासी संपत्ति एकत्र हो गई थी. ब्राह्मण मठों पर हमला इसलिए करते थे या राजाओं के माध्यम से कराते थे, ताकि वहां मौजूद अकूत संपत्ति पर अपनी दावेदारी भी पेश कर सकें. ऐसे क्रूर हमलावरों में राजा शशांक और पांड्य वंश के राजा शामिल थे.
अंत में, बात बस इतनी ही कि बौद्ध धर्म का ब्राह्मणों द्वारा विरोध विशुद्ध स्वार्थ औऱ राजनीतिक कारणों पर आधारित था या है, क्योंकि उनकी दुकान बंद होने वाली थी. दूसरे बौद्ध धर्म कुछ अलग नहीं बल्कि सनातन धर्म की ही एक और व्याख्या है.

सनातन धर्म

सनातन धर्म

वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये 'सनातन धर्म' नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नद पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू, और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं।
प्राचीन काल में भारतीय सनातन धर्म में वैष्णव, शैव और शाक्त नाम के तीन सम्प्रदाय होते थे। वैष्णव विष्णु की, शैव शिव की और शाक्त शक्ति की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह न केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरूओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, श्रुति, स्मृतियाँ,उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है। कालान्तर में भारतवर्ष में मुसलमान शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की।
जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया।
सनातन धर्म हिन्दू धर्म का वास्तविक नाम है

परंपराएँ

हिंदू धर्म, अपनी धार्मिक सिद्धांतों, और परंपराओं के पालन बहुत विशिष्ट होते हैं और inextricably संस्कृति से जुड़ा हुआ है और भारत की जनसांख्यिकी. हिंदू धर्म में world के सबसे ethnicdfy विविध निकायों में से एक है कि एक धर्म हिंदू धर्म के रूप में वर्गीकृत मुश्किल है क्योंकि रूपरेखा, प्रतीक, नेताओं और संदर्भ की किताबें है कि एक विशिष्ट हिंदू धर्म के मामले में की पहचान नहीं कर रहे हैं विशिष्ट धर्म बनाना है। हिंदू शब्द एक तरह से एक के रूप में देखा जा सकता है।
बड़े जनजातियों और भारत के लिए स्वदेशी समुदायों के निकट संश्लेषण और हिंदू सभ्यता के गठन से जुड़ी हैं। [के लोगों [पूर्वी एशियाई]] उत्तर पूर्वी भारत और नेपाल के राज्यों में रहने वाले भी हिंदू सभ्यता का एक हिस्सा थे। आप्रवास और लोगों के निपटान [से [दक्षिण भारत में हिंदू धर्म की जड़ें, और बीच आदिवासी और स्वदेशी समुदायों के बस के रूप में प्राचीन और मौलिक धार्मिक और दार्शनिक प्रणाली की नींव को contributive है।
प्राचीन हिंदू राज्यों उठकर धर्म और [भर में फैल परंपराओं [दक्षिण पूर्व एशिया]], विशेष रूप थाईलैंड, नेपाल, बर्मा, मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया [और क्या अब केंद्रीय है [वियतनाम]]। भारतीय जड़ों और परंपराओं से विशेष रूप से विभिन्न हिंदू धर्म का एक रूप [में अभ्यास [बाली]], इंडोनेशिया, जहां हिंदुओं की आबादी के 90% रूप है। भारतीय प्रवासियों हिंदू धर्म और हिंदू [संस्कृति को ले लिया है [दक्षिण अफ्रीका]], फिजी, मॉरीशस और अन्य देशों और हिंद महासागर, और [के देशों में [वेस्ट इंडीज]] और कैरेबियन के आसपास ।

हिंदू समारोह, उत्सव और तीर्थ

 हिन्दू त्यौहार
हिंदू धर्म भी धार्मिक अलग समय और जीवन की घटनाओं, और मौत के लिए अपने अनुयायियों द्वारा निष्पादित समारोह में बहुत विविधता है. हिंदुओं के प्रधान विनोद भी क्षेत्र से क्षेत्र में जो दीवाली, शिवरात्रि, रामनवमी, जन्माष्टमी, गणपति, दुर्गापूजा, होली, नवरात्री आदि शामिल हैं। भिन्न
कई हिंदू पवित्र धार्मिक स्थलों के लिए तीर्थ करने ([के रूप में जाना [तीर्थ और Kshetra |tirthas]])। हिंदू पवित्र मंदिर एस शामिल कैलाश पर्वत, अमरनाथ, वैष्णो देवी, रामेश्वरम और केदारनाथ। प्रमुख हिंदू पवित्र शहर में शामिल हैं वाराणासी(बनारस), काठमांडू (नेपाल), तिरुपति, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, द्वारका, पुरी, प्रयाग, मथुरा, Mayapur और अयोध्या।
देवी दुर्गा '[में पवित्र मंदिर s [वैष्णो]] हर साल हजारों श्रद्धालुओं के देवी को आकर्षित करती है। हिंदुओं की सालाना लाखों की सैकड़ों ऐसे [के रूप में पवित्र नदियों यात्रा [गंगा | गंगा]] ( "गंगा" संस्कृत में नदी) और उन्हें मंदिर के पास, धोने और खुद को स्नान के लिए अपने पापों को शुद्ध। कुंभ मेला (ग्रेट साफ) का सम्मेलन 10 को 20 million हिंदुओं के बीच पर इलाहाबाद (प्रयाग), उज्जैन, नासिक, के रूप में समय समय पर विभिन्न भागों का में ठहराया में पवित्र नदियों के किनारे हिंदू धर्म है पुरोहित नेतृत्व द्वारा भारत। सबसे प्रसिद्ध गंगा और यमुना [में के संगम पर है [उत्तर प्रदेश]], जो 'के रूप में जाना जाता है संगम ".

काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर
सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए इसे प्रायः कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। हालांकि, सच्चाई ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है। न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। साथ ही यह केवल एक द्रष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता। कोई एक विचार ही सर्वश्रेष्ठ है, यह सनातन धर्म नहीं मानता। इसी वजह से इसमे कई सारे दार्शनिक सिद्धांत मिलते हैं। इसके खुलेपन की वजह से ही कई अलग-अलग नियम इस धर्म में हैं। इसकी यह नरमाई ही इस के पतन का कारण रही है, औ यही विशेषता इसे अधिक ग्राह्य और सूक्ष्म बनाती है। इसका मतलब यह है कि अधिक सरल दिमाग वाले इसे समझने में भूल कर सकते हैं। अधिक सूक्ष्म होने के साथ ही सनातन धर्म को समझने के कई चरण और प्रक्रियाएं हैं, जो इस सूक्ष्म सिद्धांत से पैदा होती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सरल-सहज मस्तिष्क वाले इसे समझ ही नहीं सकते। पूरी गहराई में जानने के लिए भले ही हमें गहन और गतिशील समझदारी विकसित पड़े, लेकिन सामान्य लोगों के लिए भी इसके सरल और सहज सिद्धांत हैं। सनातन धर्म कई बार भ्रमित करनेवाला लगता है और इसके कई कारण हैं। अगर बिना इसके गहन अध्ययन के आप इसका विश्लेषण करना चाहेंगे, तो कभी समझ नहीं पाएंगे। इसका कारण यह कि सनातन धर्म सीमित आयामों या पहलुओं वाला धर्म नहीं है। यह सचमुच ज्ञान का समुद्र है। इसे समझने के लिए इसमें गहरे उतरना ही होगा। सनातन धर्म के विविध आयामों को नहीं जान पाने की वजह से ही कई लोगों को लगता है कि सनातन धर्म के विविध मार्गदर्शक ग्रंथों में विरोधाभास हैं। इस विरोधाभास का जवाब इसीसे दिया जा सकता है कि ऐसा केवल सनातन धर्म में नहीं। कई बार तो विज्ञान में भी ऐसी बात आती है। जैसे, विज्ञान हमें बताता है कि शून्य तापमान पर पानी बर्फ बन जाता है। वही विज्ञान हमें यह भी बताता है कि पानी शून्य डिग्री से भी कम तापमान पर भी कुछ खास स्थितियों में अपने मूल स्वरूप में रह सकता है। इसका जो जवाब है, वही सनातन धर्म के संदर्भ में भी है। जैसे, विज्ञान के लिए दोनों ही तथ्य सही है, भले ही वह आपस में विरोधाभासी हों, और विज्ञान के नियमोंको झुठलाते हों। उसी तरह सनातन धर्म भी अपने खुलेपन की वजह से कई सारे विरोधी विचारों को ख़ुद में समेटे रहता है। परन्तु सनातनधर्म में जो तत्व है, उसे नकारा भी तो नही जा सकता। हम पहले भी कह चुके हैं-एकं सत्यं, बहुधा विप्रा वदंति-उसी तरह किसी एक सत्य के भी कई सारे पहलू हो सकते हैं। कुछ ग्रंथ यह कह सकते हैं कि ज्ञान ही परम तत्व तक पहुंचने का रास्ता है, कुछ ग्रंथ कह सकते हैं कि भक्ति ही उस परमात्मा तक पहुंचने का रास्ता है। सनातन धर्म में हर उस सत्य या तथ्य को जगह मिली है, जिनमें तनिक भी मूल्य और महत्व हो। इससे भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है। आप उसी रास्ते को अपनाएं जो आपके लिए सही और सहज हो। याद रखें कि एक रास्ता अगर आपके लिए सही है, तो दूसरे सब रास्ते या तथ्य ग़लत हैं, सनातन धर्म यह नहीं मानता। साथ ही, सनातन धर्म खुद को किसी दायरा या बंधन में नहीं बांधता है। ज़रूरी नहीं कि आप जन्म से ही सनातनी हैं। सनातन धर्म का ज्ञान जिस तरह किसी बंधन में नहीं बंधा है, उसी तरह सनातन धर्म खुद को किसी देश, भाषा या नस्ल के बंधन में नहीं बांधता। सच पूछिए तो युगों से लोग सनातन धर्म को अपना रहे हैं। सनातनधर्म के नियमों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो मन स्वयँ ही इसकी सचाई को मानने को तैयार हो जाता है। विज्ञान जिस तरह बिना ज्ञान के अधूरा है। सनातन धर्म भी बिना ज्ञान हानि कारक है। ज्ञान मनुष्य के आस-पास होता है। उसके भीतर होता है। इस का एक उदाहरण देखिये- हवन, यज्ञ आदि का शास्त्रों में कोई विधि विधान कहा गया है। कि इसे किस महूर्त में किस आसन पर बैठ कर किस प्रकार के भोजन का इस्तेमाल करते हुए करना चाहिए, इतना सा ज्ञान तो कुछ पेचीदा नही है। परन्तु इस ज्ञान के बिना किये गये हवन, यज्ञ हानि ही करेंगे, यह ज्ञान भी पेचीदा नही है। देखने सुनने में आता है कि अज्ञानी लोग प्रति दिन आर्यसमाज, मन्दिरों, घरों, में नित्य-नियम बनाकर हवन, यज्ञ आदि करते रहते हैं। जब अनिष्ट फल प्राप्त होता है, तब सनातन धर्म क़ी नरमाई का लाभ उठाते हुए सनातन धर्म का त्याग कर देते हैं, और इस पुरातन सनातन धर्म क़ी खामियाँ तलाशने लगते है जबकि सनातन धर्म अपने आप में सम्पूर्ण सत्य धर्म है।